धर्म पूछा!
या फिर इस्लामी जिहाद की आड़ में ISI और सत्ता-मीडिया का राष्ट्रद्रोही गठजोड़?

लेखक: अधिवक्ता अमरेष यादव, सुप्रीम कोर्ट

22 अप्रैल 2025, पहलगाम।
एक बार फिर घाटी में खून बहा। एक बार फिर गोलियों की गूंज उठी। और एक बार फिर भारत की मीडिया ने असली सवालों पर पर्दा डाल दिया।

आतंकी हमला हुआ – और मीडिया का पहला सवाल क्या था? “धर्म पूछा गया?”

क्यों? ताकि असली दोषियों की पहचान से ध्यान भटकाया जा सके।


सुरक्षा चूक या साजिश?

क्या यह हमला भारत की खुफिया एजेंसियों की विफलता नहीं था?
क्या आतंकी यूं ही सीमा लांघ कर टहलते हुए आ जाते हैं?
क्या इस हमले से पहले किसी एजेंसी ने चेतावनी नहीं दी थी?

सवाल उठने चाहिए थे – लेकिन मीडिया ने उठा दिया “धर्म”।


ISI की काली छाया और मीडिया का राष्ट्रद्रोह

यह हमला सिर्फ इस्लामी जिहाद नहीं, बल्कि ISI का राज्य प्रायोजित सैन्य ऑपरेशन था।
ISI जानता है कि भारत को कमजोर कैसे करना है – धर्म के नाम पर देश को बाँटकर, और मीडिया की मदद से सच्चाई को दफना कर।

मीडिया ने आतंकियों से ज़्यादा तेज़ी से काम किया।

  • न सवाल, न पड़ताल,
  • सिर्फ एक लाइन – “धर्म पूछा गया।”

क्या ये पत्रकार नहीं, बल्कि ISI के साइकोलॉजिकल वॉरफेयर एजेंट हैं?


धर्म के बहाने जवाबदेही से भागती सत्ता

सत्ता से कोई नहीं पूछ रहा कि:

  • सेना की तैनाती कहाँ थी?
  • आतंकी कौन थे, किस रास्ते से आए?
  • खुफिया इनपुट्स को क्यों नजरअंदाज किया गया?

क्यों नहीं पूछा गया? क्योंकि सत्ता को बचाने का ठेका मीडिया ने ले रखा है।


राष्ट्रभक्ति या राष्ट्रविरोधी ड्रामा?

देशभक्ति का मतलब क्या अब यह रह गया है कि:

  • हर आतंकी हमले को हिंदू-मुस्लिम बना दो?
  • हर सुरक्षा चूक को धर्म की चादर से ढक दो?
  • ISI की साजिशों को “इस्लामी जिहाद” कहकर आसान बना दो?

अगर हाँ, तो जान लीजिए – आप देश नहीं, सत्ता और ISI के पक्ष में खड़े हैं।


सच्ची देशभक्ति का समय – अभी या कभी नहीं

देश को बचाना है तो:

  • धर्म के ढोंग से बाहर निकलो,
  • सत्ता से जवाब मांगो,
  • मीडिया के ISI-प्रायोजित एजेंडे को उजागर करो,
  • और उन पत्रकारों को बेनकाब करो जो शहीदों के खून से टीआरपी कमा रहे हैं।

अंतिम शब्द: धर्म नहीं, दोषी खोजो!

ध्यान रखो –
आतंकी गोली मारते हैं, पर लोकतंत्र को मारता है “धर्म पूछा गया” जैसा झूठा नैरेटिव।
और इस नैरेटिव के पीछे जो खड़े हैं – वे ना पत्रकार हैं, ना देशभक्त।
वे ISI के मानसिक सैनिक हैं, और सत्ता के रक्षक।

अब तय आपको करना है – आप भारत के साथ हैं या उसके दुश्मनों के साथ?

जागो। अभी नहीं, तो कभी नहीं।


लेखक परिचय:
अधिवक्ता अमरेष यादव सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। वे सत्ता और व्यवस्था की चुप्पियों के खिलाफ मुखर रहते हैं और राष्ट्रहित में निडर लेखनी के लिए जाने जाते हैं।


Leave a Reply

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free