— अधिवक्ता अमरे यादव, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया


भूमिका
भारतीय समाज में जब भी कोई परंपरा से हटकर संबंधों की बात होती है, तो उसका स्वागत कम और विरोध अधिक होता है। लिव-इन रिलेशनशिप एक ऐसा ही संबंध है जिसे कुछ लोग आधुनिकता का विकृति और कुछ पवित्र स्वतंत्रता का प्रतीक मानते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश, आजकल इसे ‘रखैल संस्कृति’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जा रहा है। यह न केवल भाषा का अधोपतन है, बल्कि दो स्वतंत्र व्यक्तियों के निर्णय और गरिमा का भी अपमान है। इसी विमर्श में मैं ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के लिए एक भारतीय अवधारणा आधारित शब्द ‘गंधर्व गृहस्थी’ प्रस्तुत करता हूँ — जो इसे ना केवल सम्मान देता है, बल्कि इसे भारतीय परंपरा से जोड़कर भी देखता है।


1. ‘लिव इन रिलेशनशिप’ क्या है?

लिव-इन रिलेशनशिप दो वयस्कों के बीच सहमति से बना वह संबंध है जिसमें वे विवाह किए बिना साथ रहते हैं। यह संबंध पारस्परिक समझ, आत्मीयता और जीवन की साझेदारी पर आधारित होता है। यह कोई अस्थायी या अवैध व्यवस्था नहीं है, बल्कि आधुनिक जीवन की एक मान्य सामाजिक और वैधानिक व्यवस्था बनती जा रही है, जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार संवैधानिक सुरक्षा दी है।


2. ‘रखैल’ शब्द का प्रयोग: एक सामाजिक अन्याय

‘रखैल’ शब्द ऐतिहासिक रूप से स्त्री के यौन शोषण और पुरुष वर्चस्व की एक अपमानजनक छाया है। इसका प्रयोग उन महिलाओं के लिए किया जाता रहा है जिन्हें समाज ने विवाह के अधिकार से वंचित किया और केवल भोग की वस्तु के रूप में देखा। जब आज की स्वतंत्र महिलाएं अपनी इच्छा से समान अधिकार और सम्मान के साथ किसी के साथ रहने का निर्णय लेती हैं, तो उसे भी उसी शब्द से जोड़ना एक गहरी पितृसत्तात्मक मानसिकता को उजागर करता है।

यह न केवल महिलाओं का अपमान है, बल्कि आधुनिक पुरुषों को भी ‘भोगी और भटकने वाला’ दिखाने की एक विकृत कोशिश है।


3. ‘गंधर्व गृहस्थी’ — भारतीय परंपरा की पुनर्स्मृति

हमारे प्राचीन धर्मशास्त्रों और ग्रंथों में विवाह के आठ प्रकारों का वर्णन है, जिनमें से एक है ‘गंधर्व विवाह’। यह विवाह दो वयस्कों के बीच बिना किसी सामाजिक रस्म के, केवल प्रेम और सहमति के आधार पर सम्पन्न होता है।

‘गंधर्व गृहस्थी’ शब्द इसी वैदिक अवधारणा को आधुनिक समाज में पुनर्जीवित करता है।

यह नाम लिव-इन रिलेशनशिप को न केवल संस्कृतिनिष्ठ पहचान देता है, बल्कि इसे उस संवैधानिक मान्यता से भी जोड़ता है जो सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णयों में दी है।


4. न्यायिक दृष्टिकोण: लिव-इन का अधिकार और सुरक्षा

भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि:

  • दो वयस्कों का एक साथ बिना विवाह किए रहना अपराध नहीं है
  • यदि पुरुष और महिला लंबे समय से साथ रहते हैं, तो ऐसे संबंध को विवाह की तरह माना जा सकता है (Presumption of Marriage doctrine)।
  • लिव-इन में रहने वाली महिला को घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के अंतर्गत कानूनी संरक्षण प्राप्त है।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि लिव-इन रिलेशनशिप किसी भी रूप में अनैतिक, असंवैधानिक या अमर्यादित नहीं है, बशर्ते उसमें सहमति, परिपक्वता और सम्मान हो।


5. नैतिकता बनाम नैतिकतावाद

यह आवश्यक है कि हम नैतिकता को निजी मूल्य मानें, ना कि उसे सामाजिक दमन का औजार बनाएं। किसी भी संबंध की पवित्रता उसके लेबल से नहीं, बल्कि उसके आचरण और नीयत से तय होती है। यदि विवाह के भीतर भी हिंसा, शोषण या छल है तो वह कितना भी वैधानिक क्यों न हो, अमर्यादित ही होगा।

गंधर्व गृहस्थी में कोई दिखावा नहीं, कोई झूठा सामाजिक प्रदर्शन नहीं, केवल परस्पर प्रेम, सम्मान और साझा जीवन की कल्पना है।


निष्कर्ष
समाज को अब भाषा, व्यवहार और दृष्टिकोण में सजग और संवेदनशील होना होगा। ‘लिव इन रिलेशनशिप’ कोई पश्चिमी बीमारी नहीं है, बल्कि यह उस गंधर्व परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है, जिसे हमारे पूर्वजों ने भी मान्यता दी थी।

“गंधर्व गृहस्थी” — यह शब्द न केवल शब्दों का समाधान है, बल्कि मानसिकता के परिवर्तन की शुरुआत भी है। हमें रिश्तों को कलंकित करने की बजाय, उन्हें समझना और सम्मान देना सीखना चाहिए।


– अधिवक्ता अमरेष यादव
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया

(यह लेख समाज में समरसता, आधुनिकता और परंपरा के संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।)


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