राम मंदिर ट्रस्ट: क्या राष्ट्रीय आस्था से निर्मित संस्था पूर्णतः निजी हो सकती है?

— अमरेष यादव, अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय

अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक घटना नहीं था। यह भारत के संवैधानिक इतिहास, न्यायिक प्रक्रिया और करोड़ों लोगों की आस्था का संगम था। सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 के ऐतिहासिक निर्णय में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह मंदिर निर्माण एवं प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट का गठन करे। इसके अनुपालन में केंद्र सरकार ने फरवरी 2020 में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया और मंदिर निर्माण तथा प्रबंधन की जिम्मेदारी उसे सौंप दी।

आज जब ट्रस्ट के संबंध में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एसआईटी गठित की गई है, तब एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष या किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं है। यह प्रश्न उस संस्था की प्रकृति से जुड़ा है, जिसे करोड़ों भारतीयों की आस्था और दान ने खड़ा किया है।

क्या यह केवल एक निजी ट्रस्ट है?

सामान्यतः ट्रस्ट दो प्रकार के होते हैं—निजी और सार्वजनिक। निजी ट्रस्ट परिवार या कुछ निश्चित लाभार्थियों के लिए बनाए जाते हैं। सार्वजनिक ट्रस्ट समाज के व्यापक वर्ग के हित के लिए कार्य करते हैं।

राम मंदिर ट्रस्ट की स्थिति विशिष्ट है।

यह किसी परिवार ने नहीं बनाया। यह किसी संप्रदाय ने नहीं बनाया। यह किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति का प्रबंधन नहीं कर रहा।

इसका गठन भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर किया। इसके पास वह भूमि है जो न्यायिक आदेश और सरकारी कार्रवाई के माध्यम से हस्तांतरित हुई।

ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह संस्था वास्तव में केवल एक निजी धार्मिक ट्रस्ट है या फिर यह एक ऐसी सार्वजनिक संस्था है जिस पर संवैधानिक उत्तरदायित्व लागू होते हैं।

करोड़ों श्रद्धालुओं का दान और सार्वजनिक जवाबदेही

राम मंदिर निर्माण के लिए देश के गांव-गांव से लोगों ने योगदान दिया। यह धन किसी एक उद्योगपति, किसी एक परिवार या किसी एक संगठन का नहीं है। यह करोड़ों श्रद्धालुओं की सामूहिक आस्था का परिणाम है।

जब धन सार्वजनिक योगदान से आता है, तब एक वैध प्रश्न जन्म लेता है—

क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि कितना धन प्राप्त हुआ, कितना व्यय हुआ और किस उद्देश्य के लिए हुआ?

यह प्रश्न केवल लेखा-जोखा का नहीं बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता का प्रश्न है।

अनुच्छेद 14 और पारदर्शिता

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 केवल समानता का अधिकार नहीं देता, बल्कि राज्य और सार्वजनिक कार्य करने वाली संस्थाओं को मनमानी से भी रोकता है।

यदि कोई संस्था करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतिनिधित्व करती है, हजारों करोड़ रुपये का प्रबंधन करती है और राष्ट्रीय महत्व की परियोजना का संचालन करती है, तो क्या उससे न्यूनतम पारदर्शिता की अपेक्षा अनुचित है?

मेरे विचार से नहीं।

पारदर्शिता किसी संस्था को कमजोर नहीं करती; वह उसकी वैधता और विश्वसनीयता को मजबूत करती है।

क्या RTI लागू होना चाहिए?

यह बहस लंबे समय से चल रही है कि क्या ऐसे ट्रस्टों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाया जाना चाहिए।

यदि कोई नागरिक यह पूछना चाहे कि—

  • कुल दान कितना प्राप्त हुआ?
  • ऑडिट किसने किया?
  • ठेके किस प्रक्रिया से दिए गए?
  • ट्रस्टियों की नियुक्ति कैसे हुई?

तो क्या यह जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए?

यह प्रश्न अंततः न्यायपालिका को तय करना पड़ सकता है। लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से देखा जाए तो जितनी बड़ी संस्था होगी, उतनी ही बड़ी उसकी जवाबदेही भी होनी चाहिए।

ट्रस्टी: मालिक नहीं, न्यासी

भारतीय विधि में ट्रस्टी कभी मालिक नहीं होता। वह केवल न्यासी (Trustee) होता है।

राम मंदिर किसी ट्रस्टी की निजी संपत्ति नहीं है। राम मंदिर किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं है।

यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

इसलिए ट्रस्टियों की भूमिका मालिक की नहीं बल्कि संरक्षक की है। उनका प्रथम दायित्व संस्था की प्रतिष्ठा और जनता के विश्वास की रक्षा करना है।

राष्ट्रीय धरोहर का प्रश्न

राम मंदिर अब केवल अयोध्या का मंदिर नहीं रह गया है। यह भारत की सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत स्मृति का प्रतीक बन चुका है।

जब कोई संस्था राष्ट्रीय महत्व प्राप्त कर लेती है, तब उसके संचालन का प्रश्न केवल धार्मिक नहीं रह जाता; वह सार्वजनिक महत्व का प्रश्न बन जाता है।

इसीलिए भविष्य में संसद या न्यायपालिका को यह विचार करना पड़ सकता है कि राष्ट्रीय महत्व के धार्मिक संस्थानों के लिए विशेष पारदर्शिता मानक बनाए जाएं।

निष्कर्ष

राम मंदिर के संबंध में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कोई आरोप सही है या गलत। आरोपों की सत्यता जांच और न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी।

वास्तविक प्रश्न इससे कहीं बड़ा है।

क्या सरकार द्वारा गठित, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से स्थापित, सार्वजनिक भूमि और करोड़ों श्रद्धालुओं के दान से संचालित संस्था स्वयं को पूर्णतः निजी संस्था कह सकती है?

यदि उत्तर “नहीं” है, तो अगला प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है—

क्या ऐसे ट्रस्टों पर संविधान आधारित पारदर्शिता, सार्वजनिक उत्तरदायित्व और संस्थागत जवाबदेही लागू होनी चाहिए?

मेरे विचार से यही वह संवैधानिक बहस है जो आने वाले वर्षों में भारतीय न्यायशास्त्र को एक नई दिशा दे सकती है।

— अमरेष यादव
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत

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