आतंक पर राजनीति: मोदी ब्रांड का पुराना नुस्खा

जब भी देश पर कोई आतंकवादी हमला होता है, एक खास तबका — गोदी मीडिया, आईटी सेल और भजपिल्ले — तुरन्त अपनी फैक्ट्री से वही घिसा-पिटा नैरेटिव निकाल लाते हैं:
“मोदी ये कर देंगे, मोदी वो कर देंगे, मोदी इस कद्दू में तीर मार देंगे, मोदी उस कद्दू में तीर मार देंगे।”
लेकिन जो लोग नरेंद्र मोदी को सतही नारों से नहीं, उनके लंबे राजनीतिक व्यवहार से समझते हैं, उन्हें पता है कि
मोदी का असली फोकस सुरक्षा नहीं, बल्कि उस हमले से “राजनीतिक फायदा” उठाने पर रहता है।
यह कोई अनुमान नहीं, बल्कि तर्क और इतिहास से प्रमाणित सच्चाई है। आइए देखिए कुछ उदाहरण:
1. गोधरा कांड और गुजरात चुनाव 2002
गोधरा में ट्रेन जलाने की घटना के बाद दंगे भड़के।
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय गोधरा को ‘हिन्दू अस्मिता’ का प्रतीक बना दिया।
पूरा चुनाव अभियान इसी ध्रुवीकरण पर केंद्रित रहा।
नतीजा: भाजपा गुजरात में दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में लौटी।
(स्रोत: तमाम स्वतंत्र रिपोर्ट्स, जैसे ‘Concerned Citizens Tribunal – Gujarat 2002’)
2. पठानकोट हमला और 2016 चुनावी प्रचार
पठानकोट हमले के बाद मोदी सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के नाम पर माहौल बनाया,
लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक का ज्यादा प्रचार चुनावी राज्यों (उत्तर प्रदेश, पंजाब) में किया गया।
सर्जिकल स्ट्राइक को “चुनावी हथियार” की तरह पेश किया गया, जिसे खुद बीजेपी के मंत्रियों ने रैलियों में भुनाया।
(स्रोत: चुनाव आयोग की चेतावनियाँ और मीडिया रिपोर्ट्स)
3. पुलवामा हमला और 2019 लोकसभा चुनाव
पुलवामा हमले में 40 जवान शहीद हुए।
इसके तुरंत बाद एयर स्ट्राइक हुई, लेकिन उससे भी ज्यादा स्ट्राइक मीडिया पर और जनमानस पर की गई।
पूरा चुनाव प्रचार ‘मोदी = सेना’ के नारे पर केन्द्रित कर दिया गया।
खुद प्रधानमंत्री मोदी ने रैलियों में सेना के पराक्रम को अपनी उपलब्धि की तरह भुनाया।
(स्रोत: सुप्रीम कोर्ट में दायर चुनावी आचार संहिता उल्लंघन की याचिकाएं)
और अब फिर से — पहलगाम।
एक और आतंकी हमला।
एक और उन्मादी प्रचार।
एक और राजनीतिक माइलेज की कोशिश।
सवाल यह है:
- अगर 10 साल से सत्ता में रहने के बावजूद आतंकी हमले रुक नहीं रहे हैं, तो सवाल उठाना चाहिए या नहीं?
- क्या हर शहीद का बलिदान सिर्फ एक ‘इवेंट’ बनकर रह जाना चाहिए?
- क्या सुरक्षा में विफलता का जिम्मेदार कोई नहीं है?
- और सबसे बड़ा सवाल — आखिर कब तक देश की सुरक्षा के नाम पर सिर्फ सत्ता की राजनीति खेली जाएगी?
निष्कर्ष:
मोदी मॉडल बहुत सीधा है:
“दर्द को नीलाम करो, शहादत को बाजार बनाओ, जनता की भावनाओं को भड़काओ और चुनाव जीतो।”
जो लोग सोचते हैं कि मोदी हर आतंकी हमले के बाद कोई जादुई समाधान निकाल लेंगे,
उन्हें जान लेना चाहिए कि मोदी की राजनीति में समस्या का समाधान नहीं, समस्या का दोहन ही लक्ष्य है।
सच्चा राष्ट्रवाद यह मांग करता है कि:
- सत्ता से सवाल पूछे जाएँ,
- सुरक्षा विफलताओं की जवाबदेही तय की जाए,
- शहीदों की शहादत का सम्मान हो, न कि राजनीतिक इस्तेमाल।
लेकिन अफसोस!
यहाँ शहीदों की चिताएँ भी सत्ता के विज्ञापन बोर्ड बन चुकी हैं।
#PahalgamTerroristAttack
#StopPoliticalExploitationOfMartyrs
#NationFirstNotPolitics
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