सुहागरात से पहले भाग जाना — मोदी जी की विदेश-नीति या पुरानी बीमारी?

✍️ अधिवक्ता अमरेष यादव


प्रस्तावना: हर बार एक ही ड्रामा — “पलटन गई, पीएम नहीं गए”

27 जवानों की शहादत के बाद पूरा देश तड़प उठा।
नारे लगे – “अब की बार आर-पार!”
मोदी जी ने भाषण में अंगार फेंका, टीवी ने आग लगा दी,
देश ने माना – अबकी बार सबक सिखाएंगे।

लेकिन फिर…

व्हाइट हाउस से एक मिस कॉल आया — और मोदी जी का सारा युद्ध रस्सी काट के नीचे गिर गया!
“अमेरिका ने अनुरोध किया है, हम शांति चाहते हैं।”

जैसे कोई दूल्हा हल्दी के बाद मंडप छोड़ कर भाग निकला हो —
“माफ़ करना, दुल्हन तो सुंदर है, लेकिन वॉशिंगटन से इनविटेशन नहीं आया!”


खंड 1: सिंदूर डालकर भागना – आदत पुरानी है

जो व्यक्ति अपनी पत्नी को सिंदूर देकर छोड़ आया,
वो राष्ट्र के प्रति कितना निभाएगा —
अब इस सवाल पर बहस जरूरी हो गई है।

  • बालाकोट में फोटोशूट हुआ,
  • राफेल से जय-जयकार हुई,
  • ब्रह्मोस की बटन दिखा के कैमरे में घूरा,
    लेकिन आखिरी मोड़ पर फिर वही अमेरिका का आशीर्वाद ले लिया।

कौन है असली प्रधानमंत्री – नरेंद्र मोदी या ट्रंप ?


खंड 2: हर बार ‘रण’ में दिखावे की दुल्हन, अंत में ‘रणछोड़’ का प्रण

मोदी सरकार की विदेश नीति अब एक टीवी सीरियल स्क्रिप्ट बन चुकी है:

  1. पहले दुश्मन को गरियाओ,
  2. फिर सेना के नाम पर तालियाँ बटोर लो,
  3. मीडिया से युद्ध युद्ध खेलो,
  4. और फिर जैसे ही अमेरिका बोले –
    “बेटा शांति रखो,”
    वैसे ही युद्ध को लपेट कर वापस रख दो।

देश सोचता रह जाता है — “युद्ध हुआ या promo?”


खंड 3: क्या भारत अब अमेरिका की sub-tenant है?

कभी अमेरिका का NSA कॉल करता है, कभी रूस का बयान आता है —
और हमारे प्रधानमंत्री ‘रणनीति’ के नाम पर घर लौट आते हैं।
मानो देश की sovereignty अमेरिका की किराए की कोठरी हो।

जनता पूछ रही है –
क्या युद्ध-विराम भारत ने लिया, या अमेरिका ने तय कर दिया?
क्या भारत सिर्फ़ तब लड़ता है, जब अमेरिका की शह हो?


निष्कर्ष: जनता अब दुल्हन नहीं, जो हर बार सिंदूर से बहक जाए

देश अब उस स्टेज पर है जहाँ
“56 इंच” से ज़्यादा 56 सेकंड की निर्णायकता की जरूरत है।

अब ये राष्ट्र टीवी की लड़ाई नहीं चाहता —
ना ‘रणवीर फोटोग्राफी’
ना ‘रणछोड़ कूटनीति’
बल्कि न्याय, संप्रभुता और आत्मनिर्णय चाहता है।


अब या तो सच बोलिए — कि हम लड़ नहीं सकते,
या फिर लड़िए — लेकिन अमेरिका की उंगली पकड़कर नहीं।
वरना अगली बार जनता कहेगी —
“सुहागरात से पहले जो भागे, वो फिर बारात में मत आना!”

– अधिवक्ता अमरेष यादव


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