ईडी को खुद में झांकने की जरूरत – सुप्रीम कोर्ट की फटकार एक चेतावनी है
लेखक: अधिवक्ता अमरेष यादव

तमिलनाडु सरकार की शराब वितरण एजेंसी TASMAC से जुड़ी कथित मनी लॉन्ड्रिंग जांच में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई हालिया फटकार, एक कानूनी टिप्पणी भर नहीं है — यह एक संवैधानिक चेतावनी है।
सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की जांच पर रोक लगाते हुए साफ कहा कि यह मामला राज्य का विषय है और ईडी ने अपनी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया है। यह फैसला केंद्र और राज्य के अधिकारों के बीच संतुलन की अहमियत को फिर से रेखांकित करता है।
संविधान और संघीय ढांचे का उल्लंघन
भारत का संविधान एक संघीय व्यवस्था को मान्यता देता है जिसमें ‘पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ राज्य सूची के अंतर्गत आते हैं। ईडी द्वारा बिना ठोस आधार के राज्य सरकार की जांच में कूद पड़ना, संविधान की इसी व्यवस्था का सीधा उल्लंघन है।
जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस मदन लोकुर ने कहा था,
“संघवाद कोई नारा नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सुरक्षा कवच है।”
अगर केंद्र की एजेंसियां राज्यों के अधिकारों को नजरअंदाज करती हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
प्रक्रियात्मक न्याय और “सजा के रूप में प्रक्रिया”
अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है — जिसमें प्राकृतिक न्याय और उचित प्रक्रिया शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की जांच को “प्रक्रिया को ही सजा बना देने” की प्रवृत्ति बताया है। बिना साक्ष्य के छापे, लंबी हिरासतें और अस्पष्ट आरोप — ये सभी कानून के शासन की भावना के विरुद्ध हैं।
चयनात्मक कार्यवाही और राजनीतिक उपयोग
ईडी पर सबसे गंभीर आरोप इसका राजनीतिक दुरुपयोग है।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से लेकर अब तक 95% ईडी की जांचें विपक्षी नेताओं के खिलाफ हुई हैं।
क्या भ्रष्टाचार केवल विपक्ष में है? या फिर जांच एक राजनीतिक हथियार बन चुकी है?
वरिष्ठ अधिवक्ता दुश्यंत दवे के शब्दों में:
“ईडी अब संवैधानिक संस्था कम, राजनीतिक औजार ज़्यादा बन चुकी है।”
यह स्थिति अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का भी हनन है।
ईडी की प्रणालीगत विफलता
2022 में विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत सरकार मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की कुछ शक्तियों को बरकरार रखा लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही की ज़रूरत भी जताई।
इसके बावजूद, ईडी की सजा दिलाने की दर 1% से भी कम है।
क्या एजेंसी का उद्देश्य सिर्फ डर फैलाना बन गया है?
सुधार की आवश्यकता और सुझाव
ईडी की शक्ति को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे संविधान के अधीन लाना आवश्यक है:
- PMLA कानून में संशोधन – गिरफ्तारी से पहले न्यायिक समीक्षा और प्रक्रियात्मक गारंटी होनी चाहिए।
- संसदीय निगरानी तंत्र – विपक्ष और सत्ता दोनों की भागीदारी से निगरानी समिति बने।
- स्वतंत्र नियुक्ति प्रणाली – ईडी प्रमुख की नियुक्ति निर्वाचन आयोग जैसी निष्पक्ष प्रक्रिया से हो।
- पारदर्शिता की बाध्यता – जांच से जुड़े आँकड़े, सजा की दर और कार्रवाई के मापदंड सार्वजनिक हों।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई ज़रूरी है, लेकिन वह संवैधानिक मर्यादाओं और प्रक्रियाओं के साथ ही लड़ी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार कोई अंतिम चेतावनी नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने का अवसर है।
अब वक्त है कि ईडी आत्ममंथन करे — और अपने रास्ते को संवैधानिक मर्यादा में लाए।
अधिवक्ता अमरेष यादव, दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करते हैं और संवैधानिक कानून, नागरिक स्वतंत्रता और संस्थागत सुधार पर लेखन करते हैं।
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