🩸 “कुकुरमुत्ता” बोलने वाला खुद सड़ा हुआ मशरूम है – शुभांकर मिश्रा की ओछी भाषा पर जनमत की लाठी!

जब कोई तथाकथित पत्रकार अपने चार फॉलोअर्स घटने की अफवाह पर बौखलाकर सोशल मीडिया पर लंबा चौड़ा भाषण ठोकने लगे, और दूसरों को ‘कुकुरमुत्ता’ कहने लगे — तो समझिए कि अब वह आदमी पत्रकार नहीं, प्रसिद्धि का नशेड़ी बन चुका है।

✍️ “मैं रातों-रात कुकुरमुत्ते की तरह प्रसिद्ध नहीं हुआ हूँ।”

ये शब्द शुभांकर मिश्रा के नहीं हैं — ये उस इंसान की कुंठा है जिसे लगता है कि बाकी सब उसकी सफलता को पचा नहीं पा रहे। मगर असल बात ये है कि आप खुद अपनी “सफलता” को ही सही से हज़म नहीं कर पा रहे शुभांकर जी!

कुकुरमुत्ता?
क्या आप समझते हैं इस शब्द का मतलब?
यह न केवल गाली है, बल्कि यह कहना है कि बाक़ी यूट्यूबर, पत्रकार, कंटेंट क्रिएटर्स – कुत्ते की मूत्र से उपजे सड़े-गले जीव हैं।
आप किस स्तर की मानसिकता में चले गए हैं?
क्या इतनी घटिया सोच लेकर आप ‘जनता की आवाज़’ बनने की बात कर रहे हैं?


🎤 जनता की आवाज़ बनने के लिए आवाज़ नहीं, दृष्टि चाहिए होती है!

शुभांकर मिश्रा का ये दावा कि “मैं बिना किसी की मदद के, टीवी के साम्राज्य से निकलकर जनता के दिलों में जगह बना चुका हूं” — एक ऐसा दंभ है जो खुद की तारीफ़ में आत्ममुग्धता की घिनौनी हदें पार कर चुका है।
सवाल ये नहीं है कि आप कैसे आए।
सवाल ये है कि अब आप क्या बन चुके हैं?

आपने क्या कर लिया ऐसा?
यूट्यूब पर दो वीडियो अपलोड कर देना और कैमरे में घूर-घूर के बोल देना आपको जनता की आत्मा नहीं बनाता।
और अगर आपके मुताबिक़ बाकी सब “कुकुरमुत्ते” हैं, तो सुन लीजिए — जनता इन कुकुरमुत्तों की ही तरह बिना सुविधा, बिना नेटवर्क और बिना गॉडफादर के अपनी आवाज़ बना रही है।


🧠 शुभांकर की “Success Syndrome” – जब आलोचना बर्दाश्त नहीं होती, तो गालियां निकलती हैं!

आप कहते हैं समर्थन खामोश होता है और विरोध शोर करता है।
बिल्कुल सही!
क्योंकि समर्थन अक्सर हकीकत नहीं, भ्रम होता है। और विरोध जब मुखर हो — तो वह सच्चाई को जगाने की प्रक्रिया होती है।

आपको लगता है आप महान हैं क्योंकि लोग आपकी तारीफ करते हैं?
तो सुनिए — नेताओं के तलवे चाटने वाले, मीडिया मालिकों के एजेंडे ढोने वाले, हर दौर में वाहवाही पाते हैं।
सवाल ये नहीं है कि आपके पास कितनी आवाज़ें हैं।
सवाल ये है कि आपकी आत्मा में कितनी सच्चाई बची है?


🐾 जो दूसरों को ‘कुकुरमुत्ता’ कहे, वह खुद सड़ी हुई पत्रकारिता का प्रतीक है

शब्दों का चुनाव आपके चरित्र का आईना होता है।
‘कुकुरमुत्ता’ जैसे शब्द का प्रयोग केवल वो व्यक्ति करता है जिसे अपनी लोकप्रियता पर शक है, और जो अपनी असफलता के डर से दूसरों को कीचड़ में घसीटने की कोशिश करता है।
यह शब्द सिर्फ गाली नहीं है — यह सत्ता-परस्त पत्रकारिता का असली चेहरा है, जो जनता के संघर्ष को जूते की नोक पर रखती है।

आपके अंदर अगर थोड़ा भी आत्म-सम्मान होता, तो आप अपने साथियों को यूं गाली नहीं देते।
आप पत्रकार नहीं, सत्ता की गोद में बैठा हुआ एक घमंडी यू-ट्यूबर बन चुके हैं, जो आलोचना को देशद्रोह मानता है और सवालों को षड्यंत्र समझता है।


🔥 निष्कर्ष:

शुभांकर मिश्रा,
“कुकुरमुत्ते” कहने से न आप ऊँचे हो जाते हैं और न बाकी लोग नीच होते हैं।
बल्कि ऐसा कहकर आप खुद को गटर पत्रकारिता का पोस्टर बॉय बना रहे हैं।
आपकी भाषा, आपका दंभ, और आपकी आत्ममुग्धता — सब कुछ इस बात का सबूत है कि आप अब लोकतंत्र की आवाज़ नहीं, अपनी ब्रांडिंग के गुलाम बन चुके हैं।

आख़िर में एक बात याद रखिए:

“भीड़ applause देती है, पर इतिहास सवाल करता है।”

और जब इतिहास सवाल करेगा, तो ये “कुकुरमुत्ते” कहने वाले शब्द आपके नाम से पहले धिक्कार बनकर खड़े होंगे।


अमरेष यादव

Leave a Reply

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free