Ran D राजनीति प्रस्तुत करती है:
“बभनान मण्डली का सत्ता-योग”
— Kaul Xerovi शैली में एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी

जब दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी,
तो बभनान मण्डली का राष्ट्रवाद भी “सरकारी बंगले” में रहता था।
सुबह संविधान बचाओ,
दोपहर में मंत्रालय पकड़ाओ,
और शाम को सेक्युलरिज्म के नाम पर मलाई चटाओ।
उस दौर में हर नियुक्ति में “योग्यता” ऐसे खोजी जाती थी
जैसे पंडित जी शादी में गोत्र खोजते हैं।
जो जितना दरबारी,
वो उतना प्रगतिशील घोषित।
अब वक्त बदला।
सत्ता की थाली बनियों के हाथ गई।
तो वही मण्डली अब
“राष्ट्रहित”, “संस्कृति”, “सनातन संकट” और
“मुक्त बाज़ार” का पाठ पढ़ा रही है।
कल तक जो लाल किले से “समाजवाद” निकाल रहे थे,
आज शेयर मार्केट देखकर राष्ट्रभक्ति नाप रहे हैं।
असल समस्या विचारधारा नहीं थी,
समस्या ये थी कि मलाई की कटोरी हाथ से निकल गई।
इसलिए आजकल कुछ चेहरे ऐसे झुलसे हुए घूम रहे हैं
जैसे सरकारी आयोग की कुर्सी पर
किसी OBC लड़के का चयन हो गया हो। 😄
Ran D राजनीति का सिद्धांत साफ है —
“भारत में कई लोग विचारधारा से नहीं,
सत्ता की रसोई से प्रतिबद्ध होते हैं।”
कांग्रेस में थे तो “उदारवादी”,
BJP में आए तो “राष्ट्रवादी”,
और अगर कल कोई तीसरी सत्ता आ जाए
तो वही लोग सबसे पहले “क्रांतिकारी” बन जाएंगे। 😄😄
आख़िर राजनीति में सबसे स्थायी चीज़ क्या है?
न संविधान।
न समाजवाद।
न राष्ट्रवाद।
सबसे स्थायी चीज़ है —
सत्ता के पास बैठकर फोटो खिंचवाने की भूख।
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