क्या वामपंथ मुखौटा लगाकर वापस लौट रहा है!

प्रस्तावना: संघर्ष विचारधारा का नहीं, उत्तराधिकार का है

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर समय-समय पर दिखाई देने वाले टकरावों को केवल “आंतरिक कलह” कह देना वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। यह संघर्ष विचारधाराओं का नहीं है। यह उस राजनीतिक स्थान पर कब्ज़े का संघर्ष है जिसे कभी वामपंथ ने बनाया, फिर ममता बनर्जी ने हथिया लिया, और अब अनेक पुराने खिलाड़ी वापस प्राप्त करना चाहते हैं।

राजनीति में अक्सर दल बदलते हैं, लेकिन राजनीतिक संस्कार नहीं बदलते। पश्चिम बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज TMC के भीतर जो असंतोष दिखाई देता है, उसके पीछे केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि एक गहरी ऐतिहासिक प्रक्रिया काम कर रही है—वाम राजनीति के पुराने ढांचे का पुनर्संरेखण।


पृष्ठभूमि: TMC की सफलता का रहस्य क्या था?

तृणमूल कांग्रेस का उदय किसी वैचारिक क्रांति का परिणाम नहीं था। यह वाममोर्चा शासन के विरुद्ध व्यापक जन-असंतोष का राजनीतिक संगठन था।

2000 के दशक में लाखों ऐसे कार्यकर्ता, स्थानीय नेता और प्रभावशाली समूह TMC में आए जो कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वाम राजनीति से जुड़े थे। सत्ता बदल गई, झंडे बदल गए, लेकिन स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क वहीं रहे।

ममता बनर्जी ने एक विशाल “राजनीतिक छाता” खड़ा किया जिसमें विरोधी विचारधाराओं के लोग भी समा गए क्योंकि लक्ष्य एक था—वामपंथ को सत्ता से हटाना।

लेकिन जब कोई दल केवल विरोध के आधार पर बनता है, तो सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद उसके भीतर उत्तराधिकार और वर्चस्व का संकट पैदा होना स्वाभाविक हो जाता है।


वास्तविक संघर्ष: लाभ किसे मिला और कौन बाहर हुआ?

TMC के सत्ता में आने से सबसे बड़ा लाभ उस राजनीतिक वर्ग को मिला जिसने स्थानीय प्रशासन, पंचायत, नगरपालिका और संगठनात्मक ढांचे पर नियंत्रण स्थापित किया।

लेकिन समय के साथ पार्टी का केंद्रीकरण बढ़ा। निर्णय लेने की शक्ति सीमित हाथों में केंद्रित होती गई।

यहीं से असंतोष शुरू हुआ।

जो लोग कभी सत्ता परिवर्तन के वाहक थे, वे स्वयं सत्ता संरचना से बाहर महसूस करने लगे। राजनीतिक विज्ञान की भाषा में इसे “रिवोल्यूशन डिवॉरिंग इट्स ओन कैडर” कहा जाता है—क्रांति अपने ही सिपाहियों को निगलने लगती है।


संवैधानिक और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण

भारतीय संविधान राजनीतिक दलों को लोकतांत्रिक संस्थाओं की तरह संचालित होने का नैतिक आधार देता है, लेकिन अधिकांश दलों में आंतरिक लोकतंत्र सीमित है।

TMC इसका अपवाद नहीं है।

जब किसी दल में संगठनात्मक शक्ति कुछ व्यक्तियों या परिवारों के इर्द-गिर्द केंद्रित होने लगती है, तब असहमति को वैचारिक चुनौती नहीं बल्कि व्यक्तिगत विद्रोह के रूप में देखा जाता है।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधी विपक्ष नहीं होता; कभी-कभी लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधी वह सत्ता होती है जो स्वयं को चुनौती से ऊपर समझने लगती है।


राजनीतिक निहितार्थ: क्या यह नया वामपंथ है?

मेरा आकलन है कि TMC से अलग होने वाले सभी लोग स्वतः वामपंथी नहीं हो जाएंगे। लेकिन यह भी सच है कि बंगाल की राजनीति में वैचारिक स्मृतियां बहुत लंबी होती हैं।

कई नेता जिन्होंने TMC को अपना राजनीतिक आश्रय बनाया था, उनके सामाजिक और राजनीतिक संस्कार मूलतः वाम राजनीति से निर्मित हुए थे।

यदि ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ कमजोर होती है, तो यह संभव है कि ऐसे समूह नए मंचों या पुराने वैचारिक ढांचों की ओर लौटें।

राजनीति में घर वापसी हमेशा झंडे की नहीं होती; कई बार मानसिकता की होती है।


सबसे मजबूत प्रतिवाद और उसका उत्तर

प्रतिवाद 1:

TMC के भीतर का संघर्ष सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। हर बड़े दल में गुटबाज़ी होती है।

उत्तर:

सामान्य गुटबाज़ी और संरचनात्मक असंतोष में अंतर होता है। जब असंतोष व्यक्तिगत टिकट वितरण से आगे बढ़कर संगठनात्मक नियंत्रण और उत्तराधिकार पर केंद्रित हो जाए, तब यह साधारण गुटबाज़ी नहीं रह जाती।

प्रतिवाद 2:

वामपंथ समाप्त हो चुका है; उसकी वापसी असंभव है।

उत्तर:

राजनीति में संगठन मर सकते हैं, सामाजिक नेटवर्क नहीं। वामपंथ का चुनावी पतन और वामपंथी राजनीतिक संस्कृति का अंत—दो अलग बातें हैं।

प्रतिवाद 3:

ममता बनर्जी अभी भी बंगाल की सबसे मजबूत नेता हैं।

उत्तर:

यह तथ्य सही है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि सबसे बड़े राजनीतिक संकट तब आते हैं जब नेता स्वयं मजबूत दिखाई दे रहा होता है और संगठन भीतर से कमजोर हो रहा होता है।


तीन यादगार टिप्पणियां

“बंगाल में झंडे बदलते हैं, लेकिन स्थानीय राजनीतिक संस्कार उतनी जल्दी नहीं बदलते।”

“सत्ता परिवर्तन आसान होता है; सत्ता संरचना बदलना कठिन होता है।”

“कई बार राजनीतिक विद्रोह भविष्य की सरकार नहीं बनाता, लेकिन वर्तमान सत्ता की कमजोरी अवश्य उजागर कर देता है।”


निष्कर्ष: मेरी स्पष्ट राय

TMC के भीतर दिखाई देने वाला टकराव केवल व्यक्तियों का विवाद नहीं है। यह उस राजनीतिक गठबंधन की अंतर्विरोधी प्रकृति का परिणाम है जिसने कभी वामपंथ को पराजित किया था।

आज प्रश्न यह नहीं है कि कौन TMC छोड़ रहा है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या TMC अपने भीतर ऐसे वैचारिक और संगठनात्मक ढांचे का निर्माण कर पाई है जो ममता बनर्जी के व्यक्तिगत प्रभाव से आगे टिक सके।

यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो आने वाले वर्षों में बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ी लड़ाई भाजपा बनाम TMC नहीं होगी।

सबसे बड़ी लड़ाई TMC के भीतर छिपे हुए राजनीतिक अतीत और उसके भविष्य के बीच होगी।

— अमरेष यादव
Advocate | Supreme Court Practitioner | Political Commentator

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