“डिग्री वाले सांसद साहब”: क्या शिक्षा अब पॉलिटिक्स का नया धंधा बन गई है?
AVK कॉलेज, बैंगलोर और घोसी के सांसद राजीव राय पर उठते सवाल

लेखक: अमरेष यादव
“बेटा पढ़ लिख कर सांसद बनो…”
ये बात पहले गर्व से कही जाती थी। लेकिन अब जब किसी सांसद का नाम डिग्री बेचने वाले कथित नेटवर्क से जुड़ने लगे, तो सवाल करना ज़रूरी हो जाता है — क्या अब सांसद बनना भी एक डिग्री सेलिंग ब्रांड बन गया है?
राजीव राय कौन हैं और AVK से उनका क्या रिश्ता है?
उत्तर प्रदेश के घोसी से सांसद, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता राजीव राय, शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। बैंगलोर में AVK Group of Institutions के साथ उनका नाम वर्षों से जुड़ा हुआ है।
AVK कॉलेज के अंतर्गत:
- AVK College of Nursing
- AVK Institute of Management
- AVK B.Ed. College
जैसे कई संस्थान संचालित होते हैं।
इन संस्थानों का दावा है कि वे उच्च स्तरीय शिक्षा प्रदान करते हैं — लेकिन इंटरनेट पर मौजूद कई रिपोर्ट्स, स्टूडेंट फोरम्स और यूट्यूब वीडियोज कुछ और ही कहानी बयान करते हैं।
डिग्री, पैसा और सवाल…
कुछ रिपोर्ट्स और स्टूडेंट अनुभवों के अनुसार:
- बिना क्लास अटेंड किए भी डिग्री दी गई।
- एजेंट्स के ज़रिए ₹3–5 लाख में B.Ed, नर्सिंग या MBA की डिग्री ‘उपलब्ध’ बताई गई।
- कॉलेज की वैधता, फैकल्टी क्वालिटी और इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठते हैं।
(ध्यान दें: ये सब आरोप हैं और स्वतंत्र जांच का विषय हैं। लेकिन जब आरोप किसी सांसद से जुड़े हों, तो क्या चुप रहना लोकतंत्र के साथ न्याय होगा?)
सांसद और शिक्षा — एक खतरनाक गठजोड़?
सांसद का शिक्षा संस्थानों से जुड़ा होना गलत नहीं। लेकिन जब उन्हीं संस्थानों पर अनियमितताओं के आरोप लगें, तो यह सिर्फ निजी मामला नहीं रह जाता।
क्या जनता को यह जानने का हक नहीं कि:
- उनके सांसद का नाम किन संस्थानों से जुड़ा है?
- क्या वे संस्थान वैधानिक नियमों के अनुरूप चल रहे हैं?
- क्या डिग्री का सौदा लोकतंत्र की नींव हिला रहा है?
प्रशासन और पार्टी की चुप्पी क्यों?
- क्या कर्नाटक सरकार, UGC या INC/NCTE जैसी एजेंसियों को इन आरोपों की जांच नहीं करनी चाहिए?
- क्या समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर अपने सांसद से जवाब नहीं मांग सकती?
अगर किसी मंत्री पर आरोप लगे, तो वो सफाई देता है। लेकिन जब बात शिक्षा की हो, तो ‘बात करने की ज़रूरत नहीं’ वाला रवैया क्यों?
सवाल जनता को पूछने होंगे…
इस लेख का मकसद किसी को दोषी ठहराना नहीं — बल्कि सवाल उठाना है।
सवाल पूछना न तो अपराध है, न राष्ट्रद्रोह। बल्कि यही लोकतंत्र की असली पहचान है।
- क्या सांसद जी इन आरोपों पर सफाई देंगे?
- क्या शिक्षा का मतलब अब केवल पैसा बन गया है?
- क्या मेहनती छात्रों का भविष्य इन डिग्री मार्केट्स की भेंट चढ़ेगा?
निष्कर्ष: शिक्षा बिक रही है, और हम चुप हैं!
अगर सांसद खुद शिक्षा संस्थानों से जुड़े हों, तो उनकी दोहरी जवाबदेही बनती है — न सिर्फ अपने क्षेत्र की जनता के प्रति, बल्कि हर उस छात्र के प्रति जो डिग्री के भरोसे अपना भविष्य बना रहा है।
अब वक्त है कि जनता सवाल पूछे।
क्योंकि जब शिक्षा बिकती है, तो समाज अंधकार में चला जाता है।
[लेखक: अमरेष यादव | जनपक्षधर आवाज | संविधान, शिक्षा और जनता के सवालों पर प्रतिबद्ध]
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