सावरकर हिन्दू महासभा के हैं, बीजेपी और संघ फ्रॉड हैं!
जीते जी सावरकर कभी संघी नहीं हुए!

✍️ एडवोकेट अमरेष यादव
“इतिहास से खिलवाड़ सबसे खतरनाक झूठ होता है — क्योंकि यह आज को भी झूठा बना देता है।”
और यही झूठ आज बीजेपी और संघ (RSS) फैला रहे हैं — जब वे दावा करते हैं कि वीर सावरकर उनके वैचारिक पूर्वज थे।
लेकिन आइए, तथ्यों की रोशनी में देखें कि सावरकर संघी नहीं थे, न विचार से, न व्यवहार से — और जो आज उनका नाम लेकर राजनीति की रोटियाँ सेंक रहे हैं, वो असल में एक ऐतिहासिक धोखाधड़ी कर रहे हैं।
🔸 संघ और सावरकर: कभी एक नहीं हुए
वीर सावरकर ने हिन्दू महासभा की अध्यक्षता की, न कि संघ की।
जब 1925 में संघ की स्थापना हुई, तब तक सावरकर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय हो चुके थे और काला पानी की सजा भुगत चुके थे।
सावरकर कभी भी संघ की शाखा में शामिल नहीं हुए, न कोई सार्वजनिक या निजी बयान उनके संघ से जुड़ाव को दर्शाता है।
अगर वो संघ से इतने जुड़े होते, तो क्या खुद संघ के संस्थापक हेडगेवार उनकी प्रशंसा करते? नहीं।
दोनों की राहें अलग थीं।
🔸 हिन्दू महासभा बनाम संघ: वैचारिक फ़र्क
हिन्दू महासभा का फोकस राजनीतिक हिन्दुत्व पर था — वो चाहते थे कि हिन्दू राजनीतिक रूप से एकजुट हों, संगठित हों और सैन्य रूप से सक्षम बनें।
वहीं संघ सामाजिक ढांचे के निर्माण पर केंद्रित था, एक ब्राह्मणवादी अनुशासन की विचारधारा पर।
- सावरकर धर्म से ज़्यादा राष्ट्र को प्राथमिकता देते थे।
- संघ राष्ट्र की परिभाषा को संस्कृति और धर्म से जोड़ता है।
- सावरकर जाति व्यवस्था के विरुद्ध थे।
- संघ, परंपरागत वर्ण व्यवस्था को संरक्षित करने में रुचि रखता है।
तो क्या यह दोनों एक जैसे हुए?
🔸 जब संघ खामोश था, सावरकर सक्रिय थे
1942 में जब देश ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की आग में जल रहा था —
- संघ चुप था।
- सावरकर ने आंदोलन की रणनीति पर असहमति जताई, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश सेना में हिन्दुओं की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए हिन्दू महासभा की ताकत लगाई।
कहां चुप्पी, कहां सैन्य सशक्तिकरण — फर्क साफ है।
🔸 बीजेपी का नकली प्यार: चुनावी रणनीति, वैचारिक विरासत नहीं
आज बीजेपी ने सावरकर को “ब्रांड” बना दिया है।
उनकी तस्वीरें, मूर्तियाँ, भाषणों में नाम, सब कुछ इस्तेमाल होता है — लेकिन सिर्फ वोट के लिए।
कभी सोचा है कि 1980 के पहले जनसंघ या बीजेपी सावरकर का नाम क्यों नहीं लेती थी?
क्योंकि तब उन्हें इसकी जरूरत नहीं थी।
अब जब भावनात्मक मुद्दों की राजनीति जरूरी हो गई है, तो सावरकर को ‘हाईजैक’ कर लिया गया है।
🔸 अगर आज सावरकर ज़िंदा होते तो?
- गाय को माता कहने से इनकार करते।
- दलितों के मंदिर प्रवेश की वकालत करते।
- विज्ञान आधारित सोच को प्राथमिकता देते।
- जातिवाद को सामाजिक शत्रु मानते।
- बिना शर्म के कहते — “मैं हिन्दू हूं, पर अंधभक्त नहीं!”
क्या बीजेपी और संघ ऐसे विचारों को मंच देते हैं? नहीं।
उल्टा, अगर आज के सावरकर होते, तो उन्हें ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ कह दिया जाता।
🛑 निष्कर्ष: सावरकर को चुराना बंद करो!
बीजेपी और संघ ने सावरकर की छवि को एक “ट्रेडमार्क राष्ट्रवादी” बना दिया है —
लेकिन हकीकत यह है कि वे उनके मूल विचारों से कोसों दूर हैं।
सावरकर हिन्दू महासभा के थे, संघ के कभी नहीं हुए।
बीजेपी-संघ का ‘सावरकर प्रेम’ एक चुनावी धोखा है — विचारधारा नहीं।
🗣️ आपकी राय क्या है?
क्या इतिहास को चुराना राष्ट्रभक्ति है?
क्या हमें सावरकर को पूरी तरह पढ़ने और समझने की ज़रूरत नहीं?
कमेंट करें, शेयर करें, और सच को फैलाएं।
📌 लेखक परिचय:
एडवोकेट अमरेष यादव
(राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक, सामाजिक न्याय के पैरोकार)
Leave a Reply