फिक्सर्स बनाम न्यायपालिका: क्या कोलेजियम की चुप्पी लोकतंत्र की सबसे खतरनाक लॉबी को बढ़ावा दे रही है?
लेखक: अधिवक्ता अमरेष यादव, सर्वोच्च न्यायालय


जब देश की सबसे बड़ी अदालत का कोलेजियम 22 न्यायाधीशों के स्थानांतरण की अनुशंसा करता है और तीन को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत करता है — और यह सब कुछ बिना एक पंक्ति का स्पष्टीकरण दिए होता है — तो यह न केवल “संवेदनशील” विषय रह जाता है, बल्कि “संशयास्पद” भी बन जाता है।

आज का यक्षप्रश्न यही है: क्या यह स्थानांतरण न्यायिक विवेक का परिणाम है, या किसी ‘फिक्सर स्क्रिप्ट’ का अध्याय?


कोलेजियम: एक मौन संस्था या एक नियंत्रित मंच?

कोलेजियम की वैधानिकता संविधान में नहीं, बल्कि न्यायिक व्याख्या से निकली है। यह संस्था अपने आप में एक “सुपर जज क्लब” के रूप में कार्य करती है — जहां तर्क, मूल्य और प्रक्रिया पर चुप्पी का पर्दा पड़ा रहता है।

क्या यही चुप्पी उन ‘फिक्सरों’ की जमीन तैयार करती है, जो लॉबी, राजनीति और निजी स्वार्थों के आधार पर स्थानांतरण या नियुक्तियों को प्रभावित करते हैं?


‘फिक्सर’ कौन हैं?

वे कोई दिखने वाले चेहरे नहीं होते।
वे वकीलों की वर्दी में भी हो सकते हैं, किसी सांसद के फोन पर भी, या मीडिया हाउस के दबाव में भी।
वे वे हैं जो न्याय को न्यायिक प्रक्रिया से नहीं, संपर्क और सौदेबाज़ी से तय करते हैं।

और जब स्थानांतरण बिना कारण के होते हैं, तो न्यायपालिका के भीतर यही तत्व अपना स्थान मजबूत करते हैं।


जब न्यायाधीश डरते हैं, तब फिक्सर फलते हैं

न्यायाधीश जो स्वतन्त्र निर्णय लेते हैं, उन्हें ‘पदस्थापन’ या ‘स्थानांतरण’ के नाम पर ‘दण्ड’ क्यों दिया जाता है?
क्या कुछ न्यायाधीशों को “ग़ैर-अनुकूल” माने जाने पर दूरदराज भेज दिया जाता है?

“यदि स्थानांतरण एक संकेत है, तो किसके लिए है? और कौन संकेत भेज रहा है?”


लोकतंत्र का सबसे मौन संकट: न्यायपालिका के भीतर लॉबीवाद

जब कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया पर दबाव संभव है, तो क्या न्यायपालिका वास्तव में उससे मुक्त है?
या वहां भी अब अपने-अपने गुट, निष्ठाएं और लॉबी बनाने वाले तत्व सक्रिय हो चुके हैं?

अगर कोलेजियम पारदर्शी नहीं होगा, तो इन कथित ‘फिक्सर्स’ को बेनकाब कौन करेगा?


निष्कर्ष: क्या कोलेजियम का मौन लोकतंत्र की चुप्पी बन जाएगा?

इस समय कोलेजियम प्रणाली को सबसे ज़्यादा आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है।
पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक विमर्श के बिना — यह प्रणाली लोकतंत्र की रीढ़ नहीं, उसकी दरार बन सकती है।

“जब न्याय की गली में न्यायाधीश भी चुप हों, तब न्याय का मूल्य कौन बोलेगा?”


लेखक अधिवक्ता अमरेष यादव, सर्वोच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करते हैं और लोकतंत्र, न्यायिक पारदर्शिता और विधिक चिंतन पर धारदार लेखन के लिए जाने जाते हैं।


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