“छोड़ी हुई स्त्री” : भाषा, समाज और मानसिकता का प्रश्न

समाज में प्रयुक्त शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं होते, वे मानसिकता, संस्कार और सामाजिक दृष्टिकोण का भी परिचय देते हैं। इसी संदर्भ में “छोड़ी हुई स्त्री” जैसे शब्द अत्यंत आपत्तिजनक और असंवेदनशील प्रतीत होते हैं। यह केवल एक महिला के वैवाहिक जीवन की स्थिति का वर्णन नहीं करता, बल्कि उसके व्यक्तित्व, सम्मान और सामाजिक अस्तित्व को भी एक नकारात्मक परिभाषा में बाँध देता है।

विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि पति-पत्नी किसी कारणवश अलग हो जाते हैं, तो केवल महिला को ही “छोड़ी हुई” क्यों कहा जाता है? क्या उस स्थिति में पुरुष “छोड़ा हुआ पुरुष” नहीं कहलाएगा? समाज की भाषा में यह असमानता स्वयं बताती है कि हमारी सामाजिक चेतना आज भी स्त्री को स्वतंत्र व्यक्ति नहीं, बल्कि किसी पुरुष से जुड़ी हुई पहचान के रूप में देखती है।

वास्तव में विवाह दो व्यक्तियों का संबंध है, स्वामित्व का अनुबंध नहीं। जब कोई संबंध टूटता है, तो वह दोनों पक्षों के बीच समाप्त होता है। फिर केवल महिला पर ही ऐसा शब्द क्यों थोपा जाता है जो दया, अपमान और सामाजिक हीनता का भाव उत्पन्न करे? यह शब्द स्त्री को मानो “अस्वीकृत वस्तु” की तरह प्रस्तुत करता है, जबकि पुरुष के लिए समाज सामान्य और सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करता है।

यह केवल भाषाई त्रुटि नहीं, बल्कि गहरी पितृसत्तात्मक मानसिकता का प्रतिबिंब है। सदियों तक स्त्री की पहचान को उसके पिता, पति या पुत्र से जोड़कर देखा गया। इसी सोच ने ऐसे शब्दों को जन्म दिया, जिनमें स्त्री की स्वतंत्र अस्मिता का अभाव है। आधुनिक संवैधानिक और लोकतांत्रिक समाज में ऐसी शब्दावली न केवल अनुपयुक्त है, बल्कि मानव गरिमा के विरुद्ध भी है।

भारतीय संविधान समानता और गरिमा का अधिकार देता है। किसी भी महिला को उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर अपमानजनक संबोधन देना सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों दोनों के विपरीत है। यदि कोई दंपत्ति अलग रहता है, तो अधिक सभ्य और तटस्थ शब्द जैसे “अलग रह रही महिला”, “तलाकशुदा महिला” या “विभक्त दंपत्ति” प्रयुक्त किए जा सकते हैं। भाषा का उद्देश्य सम्मानजनक संवाद होना चाहिए, सामाजिक अपमान नहीं।

समाज को यह समझना होगा कि संबंध टूटना जीवन की एक परिस्थिति हो सकती है, चरित्र का दोष नहीं। पुरुष हो या महिला, दोनों समान सम्मान के अधिकारी हैं। इसलिए “छोड़ी हुई स्त्री” जैसे शब्दों का त्याग केवल भाषाई सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के परिष्कार की दिशा में आवश्यक कदम है।

सभ्य समाज वही होता है, जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके आत्मसम्मान से होती है, न कि उसके वैवाहिक संबंधों की विफलता से।

Leave a Reply

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free