अब्बास अंसारी जी, इतिहास को एहसान मत बनाइए

विधायक अब्बास अंसारी का यह कहना कि:

“हमने अपनी ज़मीनों पर 18 गाँव बसाए हैं”

सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि वही पुरानी सामंती मानसिकता है जिसमें जनता को इंसान नहीं, किसी खानदान की बसाई हुई प्रजा समझा जाता है।

अब्बास अंसारी जी को शायद कोई यह बताना भूल गया है कि लोकतंत्र में जनता किसी की जागीर नहीं होती।


गाँव किसी खानदान की मेहरबानी से नहीं बसते

गाँव इसलिए नहीं बसते कि किसी जमींदार ने इजाज़त दे दी।
गाँव बसते हैं:

  • किसानों की मेहनत से,
  • मजदूरों के पसीने से,
  • बुनकरों की करघे पर झुकी जिंदगी से,
  • और गरीबों की पीढ़ियों की तपस्या से।

जो लोग आज “हमने गाँव बसाए” का दावा कर रहे हैं, उनके बाप-दादा कोई समाज सुधारक नहीं थे।

वे उस सामंती व्यवस्था का हिस्सा थे जिसे:

  • मुगल सत्ता ने संरक्षण दिया,
  • अंग्रेजी शासन ने मजबूत किया, ताकि कुछ परिवार जनता पर नियंत्रण बनाए रखें और बदले में सत्ता के वफादार बने रहें।

जमींदारी कोई सेवा नहीं, शोषण का लाइसेंस थी

इतिहास उठाकर देख लीजिए।

जमींदारी व्यवस्था में:

  • किसान लगान देता था,
  • गरीब बेगार करता था,
  • श्रमिक दबा रहता था,
  • और सत्ता कुछ खानदानों की हवेलियों में कैद रहती थी।

अंग्रेजों ने जमींदारी इसलिए नहीं दी थी कि गरीबों का भला हो।

उन्होंने जमींदार इसलिए बनाए ताकि:

जनता पर नियंत्रण आसान हो सके।

इसलिए आज जमींदारी के दौर को “दरियादिली” की तरह पेश करना, दरअसल गरीबों के संघर्ष का अपमान है।


जमींदारी उन्मूलन मजबूरी थी, उदारता नहीं

अब्बास अंसारी जी, यह मत भूलिए कि स्वतंत्र भारत को जमींदारी उन्मूलन इसलिए करना पड़ा क्योंकि वह व्यवस्था अन्यायपूर्ण थी।

यदि जमींदारी इतनी महान व्यवस्था होती, तो संविधान उसे समाप्त क्यों करता?

सच्चाई यह है कि:

  • भूमि सुधार हुए,
  • परिसीमन हुआ,
  • राजस्व ग्राम बने, क्योंकि लोकतंत्र सामंतवाद के साथ नहीं चल सकता।

जहाँ लोग पहले से बसे हुए थे, वही प्रशासनिक रूप से गाँव घोषित हुए।

कोई खानदान अपनी जेब से जनता पैदा नहीं करता।


“विकास” पर बयान देने से पहले मऊ की हालत देखिए

यदि विकास की ही बात करनी है, तो जनता पूछ रही है:

  • मऊ से युवाओं का पलायन क्यों?
  • टेक्सटाइल उद्योग क्यों बर्बाद हुआ?
  • बंद मिलें क्यों नहीं खुलीं?
  • रोजगार कहाँ है?
  • शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति ऐसी क्यों है?
  • राजनीति आज भी भय और जातीय ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द क्यों घूम रही है?

जनता अब विरासत की कहानियाँ नहीं, परिणाम देखना चाहती है।


सबसे बड़ी भूल — जनता को मूर्ख समझना

पूर्वांचल की राजनीति की सबसे बड़ी बीमारी यही रही है कि कुछ परिवार जनता को भावनात्मक बंधक समझते रहे।

लेकिन अब समय बदल चुका है।

नई पीढ़ी पूछती है:

“आपके खानदान ने क्या विरासत छोड़ी — लोकतांत्रिक विकास या सामंती प्रभाव?”

और यह प्रश्न जितना असुविधाजनक है, उतना ही आवश्यक भी।


लोकतंत्र का नया संदेश

मऊ अब:

  • डर की राजनीति,
  • सामंती अहंकार,
  • और खानदानी श्रेष्ठता से आगे बढ़ना चाहता है।

क्योंकि लोकतंत्र में:

नेता सेवक होता है, मालिक नहीं।

और जनता:

किसी जमींदार की बसाई हुई प्रजा नहीं, बल्कि संविधान से अधिकार प्राप्त नागरिक होती है।

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