सिंगरौली का जंगल बनाम कोयला साम्राज्य: क्या विकास के नाम पर भारत अपने पारिस्थितिक भविष्य को गिरवी रख रहा है?
— एडवोकेट अमरेष कृष्ण

मध्य प्रदेश के सिंगरौली स्थित धिरौली कोल ब्लॉक का विवाद अब केवल एक खनन परियोजना का विवाद नहीं रह गया है। यह मामला भारत के पर्यावरणीय न्यायशास्त्र, संवैधानिक नैतिकता, वन संरक्षण नीति और “विकास बनाम अस्तित्व” की राष्ट्रीय बहस का प्रतीक बन चुका है।
लगभग 2,672 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले इस कोयला ब्लॉक में 1,397 हेक्टेयर से अधिक घना वन क्षेत्र शामिल है। आधिकारिक रिकॉर्ड स्वयं स्वीकार करते हैं कि इस क्षेत्र में लगभग 5.7 लाख पेड़ मौजूद हैं। Forest Advisory Committee के रिकॉर्ड यह भी दर्शाते हैं कि प्रभावित वन क्षेत्र का एक हिस्सा हाथियों के आवागमन कॉरिडोर से जुड़ा हुआ है। इसके बावजूद परियोजना को पर्यावरण एवं वन स्वीकृतियाँ प्रदान की गईं।
प्रश्न यह नहीं है कि भारत को ऊर्जा चाहिए या नहीं।
प्रश्न यह है कि क्या ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ यह है कि देश के सबसे संवेदनशील जंगलों को औद्योगिक बलिदान क्षेत्र घोषित कर दिया जाए?
सिंगरौली: भारत की ऊर्जा राजधानी या पर्यावरणीय त्रासदी?
सिंगरौली दशकों से कोयला, तापीय ऊर्जा और औद्योगिक विस्तार का केंद्र रहा है। लेकिन इसी के साथ यह क्षेत्र प्रदूषण, विस्थापन, जल संकट, फेफड़ों की बीमारियों और वन विनाश का प्रतीक भी बन चुका है।
आज स्थिति यह है कि जिन इलाकों ने देश को बिजली दी, वही क्षेत्र अपने लोगों को शुद्ध हवा और स्वच्छ पानी तक नहीं दे पा रहे।
ऐसे क्षेत्र में यदि फिर से हजारों एकड़ जंगल काटे जाते हैं, तो यह केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं बल्कि cumulative ecological collapse की दिशा में एक और कदम है।
कानून का मूल प्रश्न: क्या केवल Clearance मिल जाने से पर्यावरणीय न्याय समाप्त हो जाता है?
पर्यावरणीय स्वीकृति कोई “license to destroy” नहीं है।
भारत का पर्यावरण कानून precautionary principle, sustainable development और public trust doctrine पर आधारित है। Supreme Court अनेक बार स्पष्ट कर चुका है कि प्राकृतिक संसाधन केवल सरकार की संपत्ति नहीं हैं; वे जनता और आने वाली पीढ़ियों की साझा धरोहर हैं।
यदि किसी परियोजना से:
- लाखों पेड़ों की कटाई,
- हाथी कॉरिडोर का विखंडन,
- भूजल पर दबाव,
- जैव विविधता का विनाश,
- और क्षेत्रीय प्रदूषण में वृद्धि होती है,
तो केवल तकनीकी स्वीकृतियाँ पर्याप्त नहीं मानी जा सकतीं।
न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों का दायित्व केवल कागज़ी अनुमोदनों की वैधता देखना नहीं बल्कि ecological consequences का भी परीक्षण करना है।
NGT और Limitation का प्रश्न
National Green Tribunal ने याचिका को limitation के आधार पर खारिज किया।
यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि NGT ने मामले के merits पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया।
पर्यावरणीय मामलों में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या ongoing ecological destruction को “continuing cause of action” नहीं माना जाना चाहिए?
यदि प्रतिदिन:
- जंगल काटे जा रहे हों,
- भूमि खोदी जा रही हो,
- वन्यजीव आवागमन बाधित हो रहा हो,
- और पारिस्थितिक नुकसान जारी हो,
तो क्या पर्यावरणीय न्याय केवल limitation की तकनीकी व्याख्या में सीमित हो सकता है?
इसी कारण Supreme Court ने भी याचिकाकर्ता को अन्य उचित उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी। इसका स्पष्ट अर्थ है कि संवैधानिक और पर्यावरणीय चुनौती का मार्ग अभी बंद नहीं हुआ है।
सबसे बड़ा सवाल: “No-Go Forest” की अवधारणा का क्या हुआ?
2010-11 के दौरान भारत सरकार ने कुछ अत्यधिक संवेदनशील वन क्षेत्रों को “No-Go” श्रेणी में रखने की अवधारणा विकसित की थी ताकि कोयला खनन को सीमित किया जा सके।
सिंगरौली क्षेत्र उस बहस का हिस्सा रहा है।
यदि आज उन्हीं घने जंगलों में बड़े पैमाने पर खनन स्वीकृत हो रहा है, तो देश को यह जानने का अधिकार है कि:
- ecological threshold क्या बची है?
- क्या cumulative carrying capacity का कोई वैज्ञानिक अध्ययन हुआ?
- क्या climate impact को गंभीरता से आंका गया?
- और क्या compensatory afforestation वास्तव में सदियों पुराने जंगलों की भरपाई कर सकता है?
सच यह है कि plantation और natural forest समान नहीं होते।
एक परिपक्व जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं बल्कि एक जीवित ecological civilization होता है।
आदिवासी और स्थानीय समुदाय: विकास की कीमत कौन चुका रहा है?
आधिकारिक रिकॉर्ड लगभग 620 प्रभावित परिवारों का उल्लेख करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या अनुसूचित जनजातियों की है।
भारत में अक्सर विकास का लाभ शहरी उद्योगों को मिलता है, जबकि उसकी पर्यावरणीय कीमत ग्रामीण, वनवासी और आदिवासी समुदाय चुकाते हैं।
यह environmental justice का प्रश्न है।
यदि किसी परियोजना के कारण:
- स्थानीय जल स्रोत प्रभावित हों,
- वनाधिकार कमजोर हों,
- आजीविका समाप्त हो,
- और पारंपरिक जीवन पद्धति टूट जाए,
तो केवल monetary compensation पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
न्यायपालिका की ऐतिहासिक भूमिका
हाल के वर्षों में Supreme Court ने अरावली, Great Indian Bustard और forest conservation मामलों में अपेक्षाकृत सक्रिय दृष्टिकोण अपनाया है। भारतीय न्यायपालिका ने कई बार यह सिद्ध किया है कि आर्थिक विकास संविधान से ऊपर नहीं हो सकता।
धिरौली मामला आने वाले समय में एक महत्वपूर्ण परीक्षण बन सकता है:
क्या भारत जलवायु संकट के युग में भी अंधाधुंध कोयला विस्तार की नीति पर चलेगा?
या फिर ecological constitutionalism की दिशा में आगे बढ़ेगा?
निष्कर्ष
धिरौली केवल एक कोल ब्लॉक नहीं है।
यह भारत के भविष्य का परीक्षण है।
यह मामला तय करेगा कि:
- जंगलों का मूल्य क्या है,
- पर्यावरणीय न्याय की सीमा क्या है,
- और क्या आने वाली पीढ़ियों का अधिकार आज की औद्योगिक नीतियों से छोटा है।
भारत को ऊर्जा चाहिए, लेकिन भारत को जंगल भी चाहिए।
यदि विकास का मॉडल ही प्रकृति-विनाश पर आधारित होगा, तो अंततः समाज भी असुरक्षित होगा और अर्थव्यवस्था भी।
प्रकृति केवल संसाधन नहीं है।
वह संविधान की मौन आत्मा है।
— एडवोकेट अमरेष कृष्ण
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