सांसद बनाम कानून: मऊ की अदालत ने क्या संदेश दिया?

लेखक: एडवोकेट अमरेष यादव
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया

भारत का संविधान सांसदों को विशेषाधिकार देता है, विशेष अधिकार नहीं। संसद की सदस्यता किसी व्यक्ति को जनता का प्रतिनिधि बनाती है, कानून का स्वामी नहीं।

मऊ की एक अदालत द्वारा पारित हालिया आदेश ने इसी मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत को एक बार फिर जीवंत कर दिया है।

देश की राजनीति में प्रभाव, पद और शक्ति का अपना महत्व है। लेकिन अदालत की चौखट पर इन सबका मूल्य उतना ही है जितना किसी सामान्य नागरिक का। वहां केवल दो चीजें चलती हैं—कानून और साक्ष्य।

मामला एक कथित रास्ते को लेकर था। दावा किया गया कि रास्ता दशकों से अस्तित्व में है और उसके अवरोध को रोकने के लिए न्यायालय से अस्थायी निषेधाज्ञा मांगी गई। लेकिन न्यायालय ने उपलब्ध अभिलेखों, राजस्व रिकॉर्ड, सरकारी रिपोर्टों और प्रस्तुत तथ्यों का परीक्षण करने के बाद यह पाया कि इस स्तर पर दावा प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होता।

यहीं से यह मामला केवल एक भूमि विवाद नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का आईना बन जाता है।

प्रश्न यह नहीं है कि वादी कौन है।

प्रश्न यह है कि क्या उसका दावा अभिलेखों में मौजूद है?

क्या उसका दावा राजस्व मानचित्रों से सिद्ध होता है?

क्या उसके समर्थन में ऐसे दस्तावेज हैं जो न्यायिक परीक्षण में टिक सकें?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है, तो फिर लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति का पद उसे अतिरिक्त कानूनी शक्ति नहीं दे सकता।

दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में एक प्रवृत्ति विकसित हुई है जिसमें चुनावी सफलता को सर्वशक्तिमान होने का प्रमाणपत्र समझ लिया जाता है। कुछ नेताओं के समर्थक यह मानने लगते हैं कि जनता द्वारा चुने जाने के बाद उनके नेता के प्रत्येक दावे को स्वतः सत्य मान लिया जाना चाहिए।

लेकिन अदालतें जनसभाएं नहीं होतीं।

अदालतें नारों से नहीं, प्रमाणों से चलती हैं।

अदालतें समर्थकों की संख्या नहीं गिनतीं, दस्तावेजों की विश्वसनीयता जांचती हैं।

अदालतें राजनीतिक प्रभाव नहीं देखतीं, कानूनी अधिकार देखती हैं।

यही कारण है कि भारतीय न्यायपालिका लोकतंत्र की अंतिम सुरक्षा-दीवार मानी जाती है।

यदि कल कोई साधारण किसान, मजदूर, दुकानदार या शिक्षक किसी सांसद के विरुद्ध अदालत में खड़ा होता है, तो संविधान यह सुनिश्चित करता है कि दोनों की कानूनी हैसियत बराबर होगी।

यही समानता भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य बनाती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जनप्रतिनिधि स्वयं भी इस संदेश को समझें। राजनीति का उद्देश्य संस्थाओं पर प्रभाव स्थापित करना नहीं, बल्कि संस्थाओं की गरिमा बढ़ाना होना चाहिए।

किसी सांसद की वास्तविक शक्ति यह नहीं है कि वह कितने अधिकारियों को फोन कर सकता है या कितने समर्थकों को एकत्र कर सकता है। उसकी वास्तविक शक्ति यह है कि वह कानून के सामने सामान्य नागरिक की तरह खड़ा होने का साहस रखता है।

मऊ की अदालत का यह आदेश उसी संवैधानिक आदर्श की याद दिलाता है।

यह आदेश कहता है कि भारत में रास्ते वोटों से नहीं बनते, अभिलेखों से बनते हैं।

अधिकार भाषणों से नहीं मिलते, कानून से मिलते हैं।

और न्याय राजनीतिक पहचान से नहीं, साक्ष्य से मिलता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि संसद का सदस्य भी अंततः उसी कानून के अधीन है जिसके अधीन एक सामान्य नागरिक है।

भारत में संविधान सर्वोच्च है।

सांसद नहीं।

मंत्री नहीं।

अधिकारी नहीं।

और यही भारतीय गणराज्य की सबसे बड़ी ताकत है।

— एडवोकेट अमरेष यादव
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया

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